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हिन्दू-मुस्लिम के एहसासात को मत छेड़िए

“हिन्दू-मुस्लिम के एहसासात को मत छेड़िए” ये शब्द हैं अदम गोंडवी जी के. अदम एक ऐसे कवि माने जाते हैं, जिन्होंने आज के भारत का असली और दर्दनाक चेहरा अपनी कविताओं के ज़रिये पेश किया है. अदम की कविताओं में समाज के दबे-कुचले पिछड़े वर्ग की समस्याएँ, उन पर टूटती मुसीबतें और उनके परिणामों का विश्लेषण देखने को मिलता है. 

कहा जाता है कि सिनेमा समाज का दर्पण है, मगर अदम की कवितायेँ खुद में एक तरह से समाज का आइना हैं. 22 अक्टूबर, 1947 को गोंडा, उत्तर प्रदेश में जन्मे अदम का असल नाम ‘राम नाथ सिंह’ है. पर ग़ज़ल और कविताओं की दुनिया में आते ही उन्होंने अपना नाम ‘अदम गोंडवी’ रख लिया. अदम को 1998 में मध्य प्रदेश सरकार से ‘दुष्यंत कुमार’ पुरुस्कार भी मिला.

कविता और शेर को पढ़ने का अदम जी का अंदाज़ काफी इलाहिदा था. वो कभी भी एक मिसरे को शायरों की तरह 2 बार नहीं पढ़ते थे. क्योंकि शायर रोमांच लाने के लिए हमेशा पहले मिसरे को 2 बार पढ़ते हैं. पर अदम गोंडवी श्रोताओं में कभी रोमांच भरने का इंतज़ार नहीं करते थे. वो हमेशा अपने एक के बाद एक धारदार मिसरों से सबके ज़हन में एक अलग सी छवि के साथ बस जाते थे.

अदम की कई ग़ज़लें हैं जो बहुत चर्चित हैं जिनमें ‘तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है’, ‘मई चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको’, और ‘काजू भुनी प्लेट में, विस्की भरी गिलास में’ आदि शामिल हैं.

अदम की लगभग हर कविता आपको गाँव के अंदर तक लेकर जाती है, और दिखाती है हर वो सच्चाई जो हम नंगी आखों से नहीं बल्कि उनकी कविताओं के चश्मे से देख सकते हैं. उनके शेरों का लहज़ा इतना तीखा होता था, की मनो उनका बस चले तो उस तल्खी से वो ज़माने में फैली बुराइयों को जला दें.

अदम सीधी भाषा में बात करते हुए ज़माने को बेहद तवज्जो देते थे, उन्हें लगता था की रूमानी बातें बस पुरानी बातें हो चुकी हैं. अब समाज और उनकी समस्याओं पर बात होनी चाहिए.

‘हिन्दू-मुस्लिम के एहसासात को मत छेड़िए” लिखने वाले अदम एक ग़ज़ल में ये शेर लिखते हैं,

ज़ुल्फ़-अंगड़ाई-तबस्सुम-चाँद-आइना-गुलाब,

भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब.

 

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